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प्रदोष व्रत: इस व्रत का महत्व क्या है? जानें पूजन-विधि...
December 9, 2019 • Jyoti Singh • आध्यात्म

यह तो हम सभी जानते है कि प्रदोष व्रत हर मास में दो बार आते हैं और यह हर मास की त्रयोदशी तिथि को पड़ता है। इस बार दिसंबर में यह 9 तारीख को पड़ा है। इस दिन सोमवार है इसीलिए इसे सोम प्रदोष कहा जायेगा। यदि यह मंगलवार को होता तो इसे भौम प्रदोष और शनिवार के दिन होता तो शनि प्रदोष कहा जाता।

प्रदोष व्रत इस मायने में महत्वपूर्ण है कि यदि आप भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं तो यह व्रत सर्वथा उपयुक्त है। इस दिन यदि शाम के समय विधि-विधान से भगवान शिव जी का पूजन करेंगे तो आरोग्य रहने का आशीर्वाद भी मिलेगा और भगवान भोलेनाथ भक्तों की सभी मनोकामना भी पूरी करेंगे। इस बार 9 दिसंबर को पूजा का शुभ समय शाम को 5.25 से लेकर रात 8.08 तक है। यदि आप इस अवधि में भगवान का पूजन करेंगे तो विशेष लाभ प्राप्त होगा।

पूजा विधि-
दिन भर शुद्ध आचरण के साथ व्रत रखें और भगवान का ध्यान करते रहें और शाम को पूजा स्थान पर उत्तर या पूर्व की दिशा में बैठ कर भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग की स्थापना करें और भगवान को गंगा जल, पुष्प, अक्षत, धतूरा, चंदन, गाय का दूध, भांग, फल और धूप आदि अर्पित करें। इसके बाद ओम नमः शिवाय मंत्र का जाप करें। संभव हो तो शिव चालीसा का भी पाठ करें। पूजन के पश्चात् घी के दीये से भगवान शिव की आरती करें और पूजा का प्रसाद सभी को वितरित करें। इस दिन रात्रि को भी भगवान का ध्यान और पूजन करते रहना चाहिए। सुबह स्नान के बाद ही व्रत खोलें।

व्रत से जुड़ी मान्यता-
ऐसी मान्यता है कि प्रदोष के समय भगवान शिवशंकर कैलाश पर्वत के रजत भवन में होते हैं और नृत्य कर रहे होते हैं और इस दौरान देवता भगवान के गुणों का स्तवन करते हैं। इस व्रत को करने वाले के सभी दोष समाप्त हो जाते हैं और मनुष्य का हर प्रकार से कल्याण होता है। यह भी मान्यता है कि यदि यह व्रत सोमवार के दिन पड़ता है और जो भी इस व्रत को करता है उसकी हर इच्छा फलित होती है। यदि यह व्रत मंगलवार को है तो व्रत करने वाले को रोगों से मुक्ति मिलती है, यदि यह व्रत बुधवार को है तो सभी प्रकार की कामनाएं पूर्ण होती हैं।

यदि यह व्रत गुरुवार को है तो व्रत करने वाले के शत्रु का नाश होता है और सौभाग्य में वृद्धि होती है, शुक्रवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को भ्रुगुवारा प्रदोष कहा जाता है। जीवन में सौभाग्य की वृद्धि हेतु यह प्रदोष किया जाता है। यदि यह व्रत शनिवार को पड़ रहा है तो पुत्र की प्राप्ति होती है और यदि यह व्रत रविवार को पड़ रहा है तो व्रत करने वाला सदा निरोग रहता है।